Monday, February 22, 2010

नयी डगर

कर्तव्यपथ पर चलते हुए,
खो गया कहीं मेरा अंतर,
दूजो कि ज़िन्दगी जीते हुए,
अब खुद को पहचानना हुआ असंभव ,
बढती वेदना है,बढ रहे है सवाल ,
मुस्कराहट भी अंतर्मन तक पहुच न पाती है,
सुन्दर तितलियाँ भी ना मन को लुभाती है 
सुरमयी आलाप भी बरबस शोर लगता है, 
सुन्दर कुसुमो से लदा उपवन है, 
वीरान मरुतल ही लगता है ,
बेगानी सी यह पवन है, 
बेगाना है यह समाँ,


बढती यह बैचेनी ,
बढता यह असमंज़स है,
खुद ही खुद में उलझा हूँ,
और ज़माने को सिख देता हूँ,
जीवन गुर बतलाता हूँ,


सब समझ ज़माने कि होते हुए भी
नासमझ ही खुद को पाता हूँ,
सत्य कि परिभाषा से अवगत हूँ,
पर जाने क्या सत्य क्या रचना है ,
क्या माया क्या सपना है ,

क्यूँ कोई पराया ,
जाने क्यूँ कोई अपना है ,
क्यूँ है यह रिश्ते ,
क्यूँ बंधीशो से जग बंधा है ,
समझ ना मैं पाता हूँ
चहुँ ओर के अन्धकार को,
समझ कैसे सकता हूँ,
जब अँधियारा भीतर भी भरा है, 
मुझे वह अंधकार पढना है ,
खुद ही खुद से लड़ना है ,
हर उलझन को सुलझाना है, 
अब अंतर -तिमिर मिटा ,
दशों दिशा में आत्म -अलोक फैलाना है,


किसी नयी डगर मुझे जाना है,
किसी नयी डगर मुझे जाना है ......

Saturday, February 20, 2010

जंग या जीवन

जंग   है किसे  प्यारी
पर सत्य है यह भी अडिग
कि है  जंग मानुष कि जिंदगी सारी
जीवन  की  राहों   में
जाने-अनजाने  ही सही
कई  जंग  हम लड़  जाते  है
कुछ  जीत  कर  शोक मनाते
कुछ  हारकर  भी मुस्कुराते  है
जीत मानव का ध्येय नहीं
जंग मानव का आभूषण है
जीत में वो रस नहीं
जो जंगी संघर्ष में है
मज़ा अंत में नहीं
आनंद तो नव आरंभ में है
सफ़र में जोश है जूनून है
मंजिल पर बस शांत सन्नाटा है
मौत मंजिल है, जीवन है सफ़र
याद सफ़र को करते है
दाद सफ़र को मिलती है
मौत अंत है सफ़र का
गाथाएँ लक्ष्य प्राप्ति पर
सुख-रसपान की सब बेमानी है
जियो सफ़र के हर पल को,
मंजिल से क्यों डरना,
जहाँ साथ छोड़ दे नश्वर,
उसी को मंजिल समझना,
बंधन जीत का त्याग,
नभ में विचरण का विचार करो,
अपना चपल चंचल मनोरथ,
मुश्कुराहत के साथ पूर्ण करो,
हर डग पर छेडो राग ऐसा,
की धरा में वो घुल जाये,
बने नश्वर इश्वर डगर पर,
और इश्वर नतमस्तक हो जाये|............

Monday, February 8, 2010

किशोर के दिल का हाल

बसंत  कई  बीत  गए
हम  तो  बिना  अपने  मीत रहे
खुदा  ने  सबका साथी   बनाया  है
पर  जाने  कहाँ   छुपाया  है
अब  तो  दुआ  है  यही
जल्दी  किसी  से  दिल  कि  प्रीत  बने
हमारा  अफसाना  भी  अब  प्रेमगीत  बने

सावन में मयूर के नाच से
कोयल कि मधुर कुक से 
भंवरे के कली कोतुहल से  
हिरन जोड़े स्वछंद विचरण से 
प्रेम भरे इस मौसम  में
कैसे अब शांत चित्त रहे
दुआ है यही की
हमारा अफसाना भी अब प्रेमगीत बने

पूर्णिमा के पूरण चंद की शीतल किरणे
अन्धयारी अमावस में तारों की अदभूत चमक
प्रथम प्रहर की वो शीतल पवन
ओस का वो तरुदल चुम्बन
देख यह नींद से अद्खुली आँखे
मनमीत की ही राह तके
दुआ है अब यही
हमारा  अफसाना भी अब प्रेमगीत बने

तन्हाई चुभती नहीं,
सच कहे तो तनहा है भी नहीं ,
यार दोस्तों का दामन थामे,
ज़िन्दगी सिर्फ कट ही रही
बिन साथी के दिख ना  कोई मंजिल रही
 अब साथ हम-दम का हो
और कोई ज़ीने की जिद मिले
दुआ है बस यही
हमारा अफसाना भी अब प्रेमगीत बने

Tuesday, January 26, 2010

सवाल तुझसे है ज़िन्दगी

लगता है पराया ज़माना हो गया है,
दर्द अपना बंटाना चाहता नहीं,
अब जाने कौनसी राह ले चूका हूँ
ऐ ज़िन्दगी तुझसे मैं अपने दिल का हाल कहता हूँ
आँखों में आंसू छलक पड़े,
दर्द दिल का हम किससे कहे,
ज़ख्म किसे हम दिखलाये,
जो हम-दम था हमराही था ,
जिसे जीवन का लक्ष्य बनाया था ,
उसी ने घाव दिए है ,
रहती  थी सदा मुस्कान जिन लबों पर,
उन पर  गम के फसाने  आ गए  ,
ज़माने को बदलने का जुनून,
ज़मीं को आकाश से जोड़ने सी  चाह ,
सब आईने कि तरह चूर-चूर हो गए
स्वछंद पवन के साथ खेलने वाला
हर वक़्त वासंती मस्ती में रहेने  वाला
जीवन का तात्पर्य ढूंढ़ता  हूँ
जाने क्यूँ अंधियारी गलियों में
अपनी ज़िन्दगी ढूंढ़ता हूँ
तन्हाई  से अब याराना है,
..................................
यह ना कहना अधुरा जाम पिला दीया
बस मैंने तो हाल दिल का बयां किया
पूरी कभी कोई रचना होती नहीं
यारों यह दास्ताँ अभी अधूरी ही सही
:)

थोड़ी देश भक्ति :)

लहू देकर वीरों ने हमे यह शांत चमन दीया,
कुछ लालचियों ने इसे इर्ष्या द्वेष से भर दीया
शहादत उन वीरों कि यूँ ना बेकार होगी
वादा है माँ तुझसे फिर
तेरे आंचल में गोलियों के धमाके नहीं
प्रेम गीतों कि बहार होगी
प्रेम सारंगी कि झंकार होगी
...............................

Sunday, January 24, 2010

जीवन की उस राह पर जहाँ में टूट सा गया था :)

हर  राह  पर  ठोकर  खाई ,
हर किसी ने फरेब कर ,
 घाव कई पीठ  पर दिए ,
टुकड़े लाखों दिल के किए,
हो गए बेगाने जो अपने थे,
तोड़ दिए ख्वाब  जो संजोये हमने थे,
ज़िन्दगी बोझ सी बन गई
ज़ीने की कोई वजह  नज़र नहीं आती 
तब दूर  अंधियारे आकाश से 
एक रोशनी जीने की आस दे गई
जैसे पतझड़ में  खड़े लाचार  वृक्ष को 
बसंती हवा नव जीवन  दे गई,
जैसे ग्रीष्म से प्यासी धरा को,
सावनी घटाएँ तृप्ति दे गई,
समझ अनजानी सी आ गई,
ज़िन्दगी की पहेली वो सुलझा गई,
कभी  लगता है खुद मेरी तकदीर ,
वो रूप ले मुझे सिख दे गई,
तोह कभी खुदरत का करिश्मा लगता है,
पर मुझे एक नयी ज़िन्दगी दे गई 
....................................
कभी  ख़त्म  होती नहीं दिल की उलझने  
हर लम्हा खुद में एक उलझन
जो इंसा उलझन से डर गया 
जीवन उसने क्या जीया 
समझ खुद को पाया नहीं
अपनी क्षमता   को उसने  पहचना   नहीं,

Sunday, August 2, 2009

ज़िन्दगी का सच

आशाओं के पर लेकर उड़ा था,
दुनिया की ठगी मगर समझ ना सका,
क़तर दिए पर दुनिया ने ,
आंधी में पड़े फूस के ढेर की तरह बिखर चुका हूँ,
और अब फिर ख़ुद की खोज पर चल पड़ा हूँ
जिंदगी कई रूप दिखाती है ,
कभी हँसना तो कभी रोना सीखाती है ,
पर कभी ऐसे मझधार पर ला खड़ा करती है ,
जहाँ हँसी और क्रंदन के आलावा,
कोई और ही भावः की ज़रूरत होतीहै ,
इस भावः को समझ ना पा रहा हूँ ,
दुनिया के मेले में ख़ुद को खोजे जा रहा हूँ