Sunday, November 4, 2012

पता नहीं आखिर क्या कहूँ


किसी की आँखें नम है,
किसी का दिल टुटा है,
कोई अँधेरे में खोया
कोई जग से रूठा है,
हर कोई कह रहा है,
ठीक हूँ मैं,खुश हूँ मैं,
मगर जाने क्यूँ मुझे,
हर चेहरे के पीछे
छिपा गम दिख रहा,
हर दिल अपनी दास्तान कह रहा है,
मगर शोर में कोई ना उसे सुन रहा,
तेज है रफ़्तार जिंदगी की इतनी,
की खुद ही की बात ना कोई सुन रहा,
किस और जा रहे है किसको खबर है,
ज़माने का दस्तूर है चलना, बस  यह खबर है,
आखिरी मुलाकात खुद से हुई कब थी,
शायद याद भी ना होगा,
यह बात इस जनम हुई थी,
इसका अंदाजा भी ना होगा,
आखिर क्यूँ है ऐसा की,
तकदीर लिखता माथे का पसीना,
दिल की कलम से ना कोई कागज भीगा,
क्यूँ अंतिम सांस पर भी है पछतावा,
जीवन में आखिर है क्या अपना पाया,
एक लिखी तकदीर ज़माने की थी,
उसी पर खुद को चलता पाया,
दुआ करता हूँ राह में आगे जीवन की,
एक चेहरा बिन गम का मिलेगा,
खुदा मिले ना मिले मुझे मगर,
कोई सच्चा तो मसीहा मिलेगा,
सवाल तब तक रहेगा ज़हन  में|
अभी जो तकदीर में लिखा है,
वो आसूं के संग करता हूँ,
किससे लडूं आखिर में जब,
हर कोई गमगीन बैठा है|

Sunday, October 28, 2012

आखिर क्यूँ

दर्द दिल का मैं जाने क्यूँ दबाए बैठा हूँ,
आँखों में अपनी दरिया छुपाये बैठा हूँ ,
जिसे खुदा से बढकर इश्क किया मैंने,
उसी ने अनजानो की तरह अलविदा किया,
आज टूट कर मैं खुद को खो रहा हूँ,
तन्हाई, बेरुखी बेकरारी क्या होती है,
मुझको ये खबर अब भी नहीं,
शायद मैं अपने अहम पर हुई चोट से,
मिले क्रोध के कारणवश छटपटा रहा हूँ,
शायद आत्म-घृणा से गिरा हुआ हूँ तभी
दर्द दिल का मैं यूँ  दबाए बैठा हूँ,
आँखों में अपनी दरिया छुपाये बैठा हूँ |
मैंने तो हमेशा उसकी मुश्कुराहट की दुआ की,
मैं कैसे उसके अश्को का कारण बन गया ,
ज़माने से हट मेरी चाहत थी मगर क्यूँ ,
उसके हर फैसले में यूँ ज़माना आ गया ,
क्यूँ  मेरी सच्चाई से ज्यादा नकाब की कीमत ,
क्यूँ वफ़ा से ज्यादा दुनियादारी की कीमत ,
क्यूँ मेरे लिए कांटो की राहे सही है मगर ,
ज़माने के लिए चंद फूल कम हो सकते नहीं ,
मुझे खुदगर्ज़ कह यूँ  धिक्कार दिया,
फिर भी क्यूँ जिंदगी की डोर उसे दे रहा हूँ ,
दर्द दिल का मैं यूँ  दबाए बैठा हूँ,
आँखों में अपनी दरिया छुपाये बैठा हूँ |

Saturday, October 27, 2012

दोहरापन


कहाँ घुमती है ये किस्मत,
किस दर पर  है हकीकत,
चमक हर और बिखरी है,
काली अमावस में भी यारो,
मिलती अब तो चांदनी है,
मगर जब नैन बंद होते है,
खुद से होता दीदार है,
पूनम का पूरा चाँद कम है,
ना दिनकर उतना उजियारा है,
कालिमा अंधियारे में ही मेरा,
शायद  हो रहा गुजारा है,
यह दोनों जग एक संग कैसे,
यह समझ ना दिल पा रहा है,
कोई ऐसा चिराग रोशन कर दे,
जो तम और उजार को सम कर दे,
बिखरी है जो बुँदे सुकून की,
उनको समेट जग को अर्पण कर दे|  

Saturday, September 1, 2012

याद


लफ्जों में अपनी जिंदगी को,
यूँ बयां कर सकते नहीं,
कई अक्स ऐसे होते है,
जो ज़हन में जिंदा होते है,
मगर कलम से गुज़र
कलाम में उतरते नहीं|
कई मंज़र दिल की गहराई में,
रह कर अपनी हस्ती बनाये है,
यारों वाकिफ तुम भी हो,
वाकिफ मैं भी हूँ मगर,
हमारे सिवा उनको और कोई,
महसूस कर दिल में रख सकता नहीं,
यादों को यूँ ही संजोये रखना,
क्या जाने कब आँखों के पानी में,
उन मंज़रो का दीदार  हो जाये|

Tuesday, August 14, 2012

क्या ख्वाब था क्या हो गए


एक ही टीस मन में उठती है,
क्या ख्वाब  संजोया था और क्या हो गए,
सोचा था हमने कुछ ज़माने को दे जायेंगे,
दो लम्हे ख़ुशी के, दो पल की मुस्कराहट,
कुछ ज़हन में छपी तस्वीरे छोड़ जायेंगे ,
विदा जब होंगे इस जहान से एक याद बन,
सबके दिलो को उल्लास से भरकर जायेंगे,
मगर ज़माना इतना भी अपना ना हुआ,
बस दर्द भरी यादों से झोली को है भरा,
अब सोचते है खुद को यादो से मिटा जायेंगे,
ख़ुशी का कारण ना बने किसी की तो ना सही,
खौफज़दा ख्वाब बनने का खेल नहीं खेल पाएंगे|

Wednesday, August 1, 2012

विराम

आज खबर हमको हुई,
क्या विराम का अर्थ है,
क्या पीछे मुड़ने का महत्व,
कैसे जुड़े है अतीत भविष्य,
खुद ही की बनाई दुनिया में ,
बढ़ते हुए आगे राहों पर,
मंजिल का महज़ आभास है,
भूलते मकसद मंजिल का  ,
खो जाता  खुद का सपना ,
कितना अजब सफ़र है ये ,
आज हमको खबर हुई,
क्या विराम का अर्थ है।


ठहराव आलस्य का नहीं,
दर्शन-शास्त्र सा  संगी ,
अंधियारे में खोए  उसूलो को ,
 रोशन करने वाला चिराग  है,
आवारा ज़िन्दगी को  दिशा ,
लड़खड़ाते कदमो का सहारा, 
खुद से पहचान का पड़ाव है ,
है आत्ममंथन, अंत नहीं,
ज़माने  की बातों  से परे ,
आज हमको खबर हुई,
 क्या विराम का अर्थ है।। 

Friday, July 27, 2012

मैं


कोई मुझे मसखरा कहता है,
कोई खुशमिजाज़ कहता है,
कोई घमंडी तो कोई
निष्ठूर कहता है |
अलग हूँ मैं सबकी निगाहों में,
किसी की आँखों का कांटा भी हूँ ,
किसी की राह का पत्थर भी हूँ ,
बन हर किसी की जिंदगी का हिस्सा,
आने होने का अहसास कर रहा हूँ |

मेरी पहचान क्या है,
यह सवाल लिए जहन में,
ज़माने के संग चल रहा हूँ ,
कुछ अनजान सवालो में उलझ,
जहरीले  बोल कह देता हूँ ,
मेरी बात का यूँ बुरा ना मानो,
मैं अब भी खुद के कर्मो में,
खुद को खोज रहा हूँ ,

खता जो कभी की मैंने,
दिल से माफ़ी मांगता हूँ,
जिंदगी आसान है अगर,
तो मैं जिंदगी को नहीं जानता हूँ,
साँसों से रिश्ता जुड़ा है,
जमीं का आसरा भी है,
मगर जन्म लेना ही ,
जीवन का आरम्भ नहीं है|
अब मैं जीवन की शुरुवात,
का मौका खोज रहा हूँ|