Sunday, January 15, 2012

समझो सपनो का सच


छोड़ सपनो की दुनिया,
हकीकत में आने का दर्द,
सबको है खबर मगर,
कोई ज़िक्र करता नहीं,
मगर उस दुनिया की छाया
यहाँ लाने की सबको चाहत है,
नहीं कुछ भी असम्भव,
बस एक बार पाने का,
यत्न करने की देरी है|
है यही इस दुनिया खूबी,
हर कोई व्यस्त है अपनी,
जिंदगी की खोज में,
और बेखबर इससे की ,
आखिर खोजता क्या है,
हर राह को देख अब,
यूँ आशा का त्याग नहीं 
बस कर बंद नैन खुद से,
सवाल करने की देरी है|
मंजिल और रास्ता है वही,
जो सपना बनकर आता है,
हमेशा खुशी दे जाता है,
जिसके जाने का गम सताता है,
हर ज्ञानी अज्ञानी है जो,
सपनो से मुख मोड़ता है,
मंजिल जिंदगी की है यही,
हर राही अपना सा हो,
गम भी खुशी से हो,
हर राज़ का सच है यही,
बस सपने समझने की देरी है |

Saturday, January 14, 2012

उबाल

हो गयी ज्वाला शांत भले,
लहू मगर अब भी लाल है,
बहता रगों में यह लावा ,
उतना ही विकराल है|
दहशत पर दया का दान
कब तक दे पाएंगे,
गुनाह को गलती समझ,
कब तक भुलायेंगे,
अभी दिखी है थोड़ी हलचल,
अब तमाशा शुरू होने को है|
एक हाथ धनुष,दूजे में गीता,
बुद्ध कब तक रोक पाएंगे,
सब्र का इम्तिहान लेने वाले,
सिंह को  मेमना समझते है ,
समाधी में लीन शिव को,
लाचार समझने वाले ,
तीसरे नेत्र के अंगार भूले है,
महज साँसों की तेजी से
आई तख़्त में दरारे है,
खनकने दो  कलुषित कनक,
अब तमाशा शुरू होने को है| |
खुद ही अनजान है हम,
अपने बाहुबल से अभी,
तभी नैनो में नीर है,
शुरू गुरुकुल हुआ अब कराने,
शक्ति की सार्थकता का बोध,
रण विजय से बढ़कर लक्ष्य,
है नवनिर्माण का  ज्ञान ,
वर्ना जीतने के लिए जंग ,
तो है  काफी एक हुंकार,
लिखने को नया इतहास
तत्पर है समय की कलम,
बस असल प्रहार होने को है|

Thursday, January 12, 2012

इन्तेज़ार

आखिरी मुलाकात अब भी याद है,
कर खुद को राज़ी किया फैसला,
इज़हार इश्क का उनसे हम करेंगे,
आज दिल को खुली किताब बना देंगे,
हर ख्वाब हर ख्वाहिश हर अरमान,
हर खता का ज़िक्र कर देंगे|
जाने कितनी शायरी करो बेकार है,
कर नहीं सकती वे उनको ज़रा भी बयां,
मेरे अलफ़ाज़ लडखडा कर टूट जाते है,
महज़ उनका ज़िक्र करने भर में,
जाने और कितनी बातें उनसे कहने को,
मन में लिए उन तक पंहुचा,
सलाम दुआ कर जब कहने को हुआ,
वे बोली अभी आती हूँ कुछ पल ठहरो,
पल गुज़रे,दिन गुज़रे,गुजर गए साल कई,
अब भी इतेजार है इज़हार के पल का,
संग लिए बैठा हूँ तोहफा दिल का,
इनकार और इकरार दोनों ही मंज़ूर है,
मोहब्बत का सफर शुरू करने के लिए,
कोई उन तक मेरा पैगाम पंहुचा दे,
की अब भी नज़रे राहों पर टिकी है,
हर पल हलचल का इतेजार कर रही है|

खुद खुदा भी मुझसे हो चूका है खफा,
लौटा दिए  कितने फरिस्ते उसके ,
लेकर आये  जो मौत का पैगाम,
अब पथराई आँखों में है इतेजार ,
कब अपनी साँसों  को दूँ विराम ,
थका इतेजार से अब भी नहीं 
बस इस जिंदगी पर अब हक नहीं| 

Wednesday, January 11, 2012

साहिल

जब हम बीच दरिया में थे,
तो किनारों की ख्वाहिश थी,
थपेड़े खाती कश्ती से रंजिश थी,
देख नीर अपार नैनो में नीर था,
पर इरादा कुछ और था तक़दीर का,
आज धरा पर है कदम मेरे ,
हर ओर हरियाली की चादर ओढ़े,
खुशियों के मृदंग बज रहे है ,
फूलो से आशियाँ सज रहे है,
मगर तन्हाई का आलम है,
सब कुछ है फिर भी,
कुछ कम लगता है,
लहरों की याद सताती है,
कश्ती फिर मुझे बुलाती है,
नहीं अंत मेरी डगर का ,
लगता यह साहिल है,
बाकी है सांस मुझमे ,
दरिया में जाने का साहस है,
है बहुत साहिल जहान  में,
अभी तो बस आगाज़ है|

Tuesday, January 10, 2012

खता

अश्को की सलामी देकर हम,
उनकी राहों से विदा हो जाते,
फिर ना कोई राह मिला दे,
इस खातिर चलना छोड़ देते,
उनके एक अश्क मोती से कम,
कीमत है इस जान की ,
मांग कर तो देखते एक बार,
मुश्कुराते हुए अर्थी पर लेट जाते
बेशक हमे प्यार जताना आता नहीं,
मगर वे हमारे आसूं ही पढ़ लेते|

Sunday, August 7, 2011

मेरी परिधि

मेरे परो की क्षमता को,
मापदंडो से ना परखो तुम,
मेरे ख्वाबो की उड़ान को,
मेरे कृत्यों से ना नापो तुम,
मैं पंछी  मतवाला हूँ
तुम्हारी परिधि का दास नहीं,
प्रेम परिधि से बंधा हूँ,
पर यह ना समझो मुझे,
मेरी परिधि की पहचान नहीं|

अभी खामोश हूँ मैं ,
नहीं कोई हरकत है परो में,
लगता हिम सा शीत अंतर,
बेजान लगते है इरादे मेरे,
देख  मुझे ना उपहास करो ,
जग कल्याण की खातिर,
है  चिर समाधी धरी मैंने ,
है दिनकर सा ताप मुझमे,
हूँ अनंत का वारिस  मैं ,
दिखलाता हूँ  नहीं मगर 
है मेरी परिधि अनंत से परे|
निर्बलता की मूरत नहीं ,
विनाश का पर्याय हूँ,
थमा निस्वार्थ प्रेम बंधनों से,
नहीं सहस्त्र शस्त्र शक्ति से ,
मेरे शिव को ना ललकारो तुम  ,
कहीं तांडव सा विनाश ना हो,
रोको अपने वारो को तुम ,
कहीं टूट ना प्रेम बंधन जाये,
करो सम्मान अपनी परिधि का,
कहीं मेरे पर ले मुझे
मेरी परिधि ना पहुच जाये|

Saturday, August 6, 2011

थकी जिंदगी की ख्वाहिश

कभी जिंदगी मुस्कुराती थी
कभी जिंदगी रुलाती थी
कभी धुप-छाँव से खेलाती थी
पार आज एक ख़ामोशी है
तन्हाई के आगोश में
खुद सहारे को तरसती
रेत के घरोंदे को तकती
कुछ नहीं बस इन्तेज़ार
कब बदलते मौसम में
यह पलकें नैनो का
पर्दा करना बंद कर दे|

यादों के सागर में खोयी
 खुद  ही के  भंवर में गुम
खुद के वारो से हो घायल
थके राही सी मायूसी लिए
हर पल  बस  यही दुआ
कुछ खुशहाल यादों की
तस्वीर कर खुद पर अंकित
यह पलकें नैनो का
पर्दा करना बंद कर दे|

बिन मकसद बिन राह,
बिन किसी ख्वाहिश अब,
रिश्तों की रेशमी डोरियों की ,
मजबूरी के बंधनों में बंधे,
कुछ टूटे रेशमी धागों में ,
कुछ खोजती कुछ सोचती,
लिए इंतज़ार  संग की आखिर ,
कब ख़ामोशी  को तोड़,
यह पलकें नैनो का
पर्दा करना बंद कर दे|