Saturday, May 31, 2014

देश मेरा

बना झुण्ड गीदड सिहों का शिकार कर रहे|
जब से रंगे सियार तख़्त पर है सो रहे|
पाबंधी है सिंह को अब दहाड़ने पर मगर|
हो निर्भीक स्वान अपना राग है रो रहे|
है बाज पिंजरे में निरपराध बंद हुए|
और कबूतरबाज़ी के खेल है हो रहे|
जब बर्बरता को एक चूक कही गयी|
तब मेरी भी मूक बगुला साध टूटी|
तु ही बता भारत भूमि की अब|
कैसे तेरी अब मैं वंदना करूँ|

जननी

जननी तेरी कोख काली हो गयी,
कुदरत तेरे तप में श्राप दे गयी,
जिन हाथो को देखना ही सुकून था,
आज उनकी सिरत खुनी हो गयी,
जिन आँखों में तेरा हर सपना था,
जिनको नमी से तूने दूर रखा था,
आज अजब तमाशा देखता है,
उन आँखों में अब लहूँ बस्ता है,
जिन कदमो को चलना सिखाया,
जिनके लिए चुन सभी काँटों को,
एक आसन राह को बनाया,
अब वही कदम देखो कैसे,
ठोकर मासूमो को मार रहे,

अजीब है मगर मासूम जननी,
तेरा सृजन ही तुझे तडपा रहा,
लज्जित कोख तेरी होती है,
हर दिन जाने अपनी कृति पर,
कितनी जननी रोती है|    

Wednesday, February 19, 2014

किससे आखिर दुआ करूँ

बनाया भीरु नायक ने भिक्षुक,
कर रहे हर दर फरियाद,
आत्मसम्मान को बेच कर,
जी रहे है जिंदगी आज,
सब होठ सिल बैठे है,
मान ज़ुल्म को भाग्य,
इन रगों का लावा अब,
शीतल नीर सा हो चूका,
मायूसी की चिता से फिर,
जिंदा हो उठने की खातिर,
कोई तो बतला  दो मुझे,
किससे आखिर दुआ करूँ|
लफ्ज़ ही खो चूका हूँ,
ललाट पर है पसीना,
मंथन मन में है यही,
कि किस रह पर चलूँ,
किस दर पर शीश धरुं,
कौन युक्ति करूँ की आखिर,
इन्सान फिर से जाग सके,
चिर तम का यह कलेजा,
रोशन अब जहान हो सके,
कोई तो बतला दो मुझे,
किससे आखिर दुआ करूँ।
बंद पड़े है गिरजे मस्जिद,
फरियाद ना सुने गुरु साहिब,
कहा था धर्म की हानि पर,
जग में फिर आऊंगा में,
अब धर्म ख़त्म होने को है,
फिर भी चिर निद्रा में,
क्यों है आप बंसीधर,
कोई तो बतला दो मुझे,
किससे आखिर दुआ करूँ।

Tuesday, February 18, 2014

भीरु की तकदीर

कैसी अजब रित है जग की,
सच को पाबंध करे बेडियो में,
झूठ को छप्पन भोग लगे,
कराह रही नेकी देख दर्द,
बदी की सल्तनत बन गयी,
सवाल पूछे इंसानों से जटिल,
हैवान बिन रोक-टोक गुमे,
गजब है तासीर हमारी तभी,
विनाश को तकदीर समझे,
जो जग के शासक बने है
कागजो सी शक्सियत है,
कांच सा है इनका सीना,
है मनुज की भीरु संतानों,
सिहों के समक्ष भी कब,
लोमड सीधे युद्ध जीती है,
एक हुँकार तो भर देखो,
कैसे तकदीर बदलती है।

Tuesday, September 17, 2013

मन में मंथन

बैठा हूँ सागर के साहिल पर,
लहरे कदमो को छू रही है,
मादकता ले चल रही पवन,
चांदनी से रोशन अम्बर है,
खो जाये खुदरत के सौन्दर्य में
इतना मनमोहक वातावरण है,
मगर अशांत कुछ बातों मन,
खुद ही खुद में उलझा है,
सवाल जवाब हो रहे अंतर में,
चल रहा अजब सा मंथन ये,
अपने कर्तव्य को समझने की
एक नाकाम सी कोशिश कर रहा हूँ,
साहिल पर इस सागर के |
एक और गिरती मानवता
एक और सामाजिक बंधिश है,
किस राह पर चलना है,
किस मंजिल का करना है वरन,
गलत कोई राह है नहीं,
मगर फिर भी क्यूँ ये चिंतन,
सागर के अंतर से अधिक,
शायद गहरा है मेरा अंतर,
एक सैलाब का इंतज़ार करता,
जो एक राह प्रस्शत करे ,
इसी सोच में बैठा हूँ मैं ,
साहिल पर इस सागर के ||
मनोरम रूप देख सागर का,
तूफान की कल्पना कैसे करे,
देख तूफान को सागर में,
यह मनोरम दृश्य अकल्पनीय है,
दोनों रूपों में कितना अंतर,
बस यही सोच रहा हूँ,
क्या मुझमे भी क्षमता है,
विनाशक हो भी मंनोहक होने की,
बना आशियाँ उसे वीरान करने की,
दोनों रहो पर क्या चल सकता हूँ
पूछ रहा बस यही सवाल मैं,
बैठ साहिल पर इस सागर के|
कहते कृष्ण  करो कर्म,
फल पर ना तुम गौर करो,
मगर कर्तव्य ही बंधन हो,
कैसे कर्म फल का ना,
 निर्बल मन में चिंतन हो,
मुंद आँखे क्या पथ रचुँ,
पर है भाव वही संशय के,
मेरे धर्म की परिभाषा क्या है,
क्या तात्पर्य है मेरे जीवन का,
मेरी मन का मोती कहाँ  है,
यही सोच हरदम डूबता हूँ,
मन के अपर सागर में,
बैठा हूँ शांत साहिल पर,
मन के सागर में मंथन लिए| 

Sunday, September 15, 2013

आखिर कौनसा गुनाह

किसके गुनाहों की सजा,
मेरा देश भुगत रहा है,
वो धरा जिसे प्रकृति ने
हर सम्पदा प्रदान की,
जहाँ सभ्यता के अंकुर
वट-वृक्ष में बदले,
क्यूँ आज वही देश
ना सभ्य है ना समृद्द,
क्यूँ धुंधला भविष्य और
लहू-लज्जा से सना अतीत,
क्यूँ नीर बहाती है आज
बहु बेटियाँ हर घर में,
क्यूँ सांझ भी अब यहाँ
सवेरे का सपना बनी है,
क्यूँ जिसे दिनकर बन
राहों को सरल करना था,
आज खुद गुमराह हुआ है
कोई बतला दे मुझे बस इतना
किसके गुनाहों की सजा,
मेरा देश भुगत रहा है|
जवाब कई उभरे सवालो पर,
कहीं राजनीती के स्वार्थ,
कहीं व्यापारी का लालच,
कहीं पिछडो के आलस्य,
कहीं संकीर्ण धर्म पर आरोप,
किसी ने जात-पंथ,लिंग भेद ,
किसी के क्षेत्रवाद पर कटाक्ष,
किसी ने विदेशियों कुटिलता,
किसी ने भाग्य को दोषी कहा|
मगर सवाल अब भी वही है,
जवाब अब भी कहीं नहीं है
क्या कमी आखिर राह गयी,
कौनसी भावना खत्म हुई,
क्यूँ राजनीती कलंकित,
क्यूँ स्वार्थसिद्धि प्रबल हुई,
शायद दोषी है वो शिक्षक,
जो चरित्र अपने विद्यार्थी में
देश प्रेम के ना सींच सका,
मौलिकता का पतन शायद,
विद्याध्ययन से ही शुरू हुआ,
जागो विश्व गुरु के गुरु-वर,
देश की पुकार सुनो,
ज्ञान के दीपो से पुनः रोशन
मेरे इस पवन वतन को करो|

Sunday, August 4, 2013

असमंजस

मैं बस यही अब चिंतन करूँ,
क्रंदन करूँ या अभिनन्दन करूँ,
जीत की इस मधुर बेला में,
तम हरण का उत्सव करूँ या,
विधाता की इस निष्ठुर लेखन पर,
भिगो नैन अब मातम करूँ,
लहू से सुसज्ज्ति हो इठलाती,
उस खडग की मैं पूजन करूँ,
या प्रियजन का लहू देख,
क्रोधित हो उसे दफ़न करूँ,
हूँ बस इसी चिंतन मैं की,
कृन्दन करूं या अभिनन्दन करूँ|
सीख समय की सरल है,
विजय वीर का आभूषण है,
मगर कैसे विजय को अब,
इस पल परिभाषित करूँ,
जिनकी रक्षा का प्रण लेकर,
गिरिराज के शीत शिखर पर,
मरु के झुलसाते धरातल पर,
अडिग हो प्रकृति से लोहा लिया,
आज कर वार उन्ही पर,
विजय का वहशी वरन किया,
देख अपने बदलते रूप को,
हूँ बस इसी चिंतन मैं की,
कृन्दन करूँ या अभिनन्दन करूँ|
क्यों मेरे घर की ये पावन,
हवन अग्नि अब ज्वाला बनी,
क्यूँ पर्वो की तैयारियों में,
दिन की उदर अग्नि धधक रही,
चाँद को छु लिया है मगर,
मानवता रसातल चली गयी,
है यह कैसी पवन जो अब,
मानव - मानव में ही भेद कर रही,
बन रहे स्वप्निल समाज की,
उन्नति देख एक आँख इठलाती,
तो देख दुर्गति दूसरी अश्रु है बहाती,
ह्रदय के असमंजस का कैसे हल करूं,
हूँ बस इसी चिंतन मैं की,
कृन्दन करूँ या अभिनन्दन करूँ|