Wednesday, May 4, 2016

काश हम भी इंसान होते

यहाँ हो रहे बस मौत के सौदे,
इस हैवानी खेल को देख हम ,
बस  इतनी  सी दुआ करते,
काश हम भी इंसान होते।

यूँ तो कोई नयी बात नहीं है,
इंसानियत तो बिकती ही है,
कभी तो लुटेरों का वार था,
कभी व्यापारी हथियार था,
कभी शहंशाह का मन था,
कभी कबीलों का द्वंद्व था,
वजह अलग अंजाम वही है,
हर मोड़ पर बलि चढ़ी है,
यूँ ही तकदीर पर रोते रोते,
बस  इतनी  सी दुआ करते,
काश हम भी इंसान होते।
क्या फायदा इस समाज का,
क्या मोल है इस देश का,
जब अलग अलग है कीमत,
हर इंसान की ज़िन्दगी की,
अर्थ , सत्ता और शोहरत, 
ऊँचे दर्जे की नीलामी है,
स्वेद, श्रम से साधरण जीवन,
मृत होने की निशानी है,
थक गए यूँ ज़िन्दगी खोते खोते,
बस  इतनी  सी दुआ करते,
काश हम भी इंसान होते।
लाखों यत्न कर लिए मगर,
असल में यह खेल क्या है,
समझ बिलकुल आता नहीं,
ग़मगीन प्रजा पर कर शासन,
कैसे तुम आखिर सम्राट हुए,
जब तक भूखा एक भी जन,
कैसे सुकून हो एक भी क्षण,
 शायद परिभाषा ही है गलत,
राजधर्म और राजनीती की,
थक गयी है अब इंसानियत,
स्वार्थी ज़िन्दगी को ढ़ोते ढोते,
अब  इतनी सी दुआ है करते,
की काश हम भी इंसान होते।




3 comments:

  1. आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 06/05/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
    अंक 294 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (06-05-2016) को "फिर वही फुर्सत के रात दिन" (चर्चा अंक-2334) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. कुलदीप जी और रूपचन्द्र शास्त्री जी आप दोनों का मेरी रचना को अपने मंच पर स्थान देने के लिए बहुत शुक्रिया|

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