Sunday, March 25, 2012

सफर तो करना है

खुद के मन पर ना,अब कोई बस रहा,
उनकी एक झलक को व्याकुल हो रहा,
इस कदर तो कभी राह से भटका ना था,
मगर अब राहों की मंजिलो की फ़िक्र नहीं,
भूल दुनियां की हर ज़िम्मेदारी को ,
बस सच और सपनो का जहाँ जोड़ रहा,
कोई शिकायत नहीं मुझको बहकने से,
मगर स्वप्न सदैव आँखों में ठहरता नहीं,
जाग फिर जीवन की राहों पर जाना है,
संग कोई हो ना हो सफर तो करना है|
यहाँ एक ही बात हर शख्स कहता है ,
सपनो की खातिर ज़माने के साथ चलो ,
मगर ज़माना ही सपनो में अड़चन है ,
संग चलूँ ज़माने के तो सपने छूटते है ,
ना संग चलूँ तो कई अपने रूठ जाते है ,
क्या है कोई  तराजू ऐसा जिस पर,
दोनों की अहमियत का तोल कर सकूँ ,
सवालो से भरी जिंदगी का असमंजस है,
लगता है पाना मजिल को आसान ,
मुश्किल मंजिल का चुनाव करना है,
इन्तेजार करती अब भी राहे है,
संग कोई हो ना हो सफर तो करना है|

6 comments:

  1. बहुत ही सुंदर भाव सँजोये है आपने ,आपकी यह प्रस्तुति पढ़कर एक पूराना हिन्दी का गीत याद आया "यह जीवन है, इस जीवन का यही है यही है रंग रूप..... :) सार्थक प्रस्तुति समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।
    http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/2012/03/blog-post_26.html

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  2. जाग फिर जीवन की राहों पर जाना है,
    संग कोई हो ना हो सफर तो करना है|
    बहुत बढ़िया

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  3. बहुत सुन्दर , सार्थक सृजन.

    कृपया मेरे ब्लॉग meri kavitayen पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा .

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  4. चल पड़े सफर पर जो अकेले.......
    काफिला जुड़ता जाएगा...............................

    सुंदर रचना....

    अनु

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  5. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!
    शुभकामनायें.

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  6. बहुत ही सुन्दर भाव व्यक्त किया है मन गद-गद हो गया है ।

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