Saturday, May 28, 2011

लहू सरिता

सोच कर देखो तो यारो
लहू किस काम आया है,
धमनियों  में बहते लावा में
किस बात से उफान आया है
प्रेम के भावो की जगह क्यूँ
द्वेष की काली छाया है
आज मुस्कुराती कुदरत में क्यूँ
खमोशी का मौसम आया है
सोच कर देखो यारो
लहू किस कम आया है|
बह रहा लहू राहों पर
बन नफरत की कहानी
सूख गया आँखों में ही
बन दर्द की निशानी
कहता  लहू खुद लहू से
मिल मुझमे तुने व्यर्थ
कर दी मेरी क़ुरबानी
बार-बार लहू की पुकार करती
जाने ये कैसी प्यासी सरिता है |
सोच कर देखो यारो
लहू किस काम आया है|

7 comments:

  1. बह रहा लहू राहों पर
    बन नफरत की कहानी
    सूख गया आँखों में ही
    बन दर्द की निशानी gahre bhaw

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  2. bahut badiya apne bhavo kee abhivykti.
    ab to baat baat par lahu aankho me bhee utar aata hai ........

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  3. बेहद उम्दा भावाव्यक्ति।

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  4. आप का बलाँग मूझे पढ कर आच्चछा लगा , मैं बी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    मै नइ हु आप सब का सपोट chheya

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  5. कल 15/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. "प्रेम के भावो की जगह क्यूँ
    द्वेष की काली छाया है
    आज मुस्कुराती कुदरत में क्यूँ
    खमोशी का मौसम आया है"

    शुभकामनाएं एवं आशीष

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  7. accha likhte ho likhte raha karo..........

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