Saturday, May 31, 2014

सारथी

बेवजह एक जंग सी छिड़ी है,
मेरे घर के सुन्दर आँगन में,
तलवार लिए हर भाई खड़ा है,
मंथरा सिंहासन पर बैठी है,
हो रहा ज़िन्दगी का सौदा,
अब तो चोपट की चालो से,
कोई ऐसा नहीं मिला जिसकी,
तलवार पर निर्दोष का लहू नहीं,
सब कुछ बिलकुल सही है मगर,
राम - कृष्ण की कोई खबर नहीं,
अब हर मनुज को बन कृष्ण,
विनाश का काल बनना होगा,
इस बार सुदर्शन से संहार नहीं,
बन सारथी हर भटके को,
सही पथ पर ले जाना होगा|

2 comments:

  1. नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 02/06/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

    [चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
    सादर...
    चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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  2. अब हर मनुज को बन कृष्ण,
    विनाश का काल बनना होगा,
    इस बार सुदर्शन से संहार नहीं,
    बन सारथी हर भटके को,
    सही पथ पर ले जाना होगा|
    ...बहुत सही ..

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