Tuesday, November 11, 2014

दीवाना

मेरी दीवानगी अब भी वही है,
बस इज़हार का अंदाज़ अलग है,
तब बिखरे मोती की माला थी,
आज बिखरे सपनो की सौगात है,
लफ्ज़ मुश्कुराहट बिखेरते थे,
अब आँखे नम कर जाते है,
यकीन तब भी था लकीरों पर,
यकीन आज भी है लकीरों पर,
बस गम इतना सा है की ,
वो लकीरे खुदा ने खिची थी,
यह लकीरे तुमने खिची है,
मैं बंधा हूँ तेरे एतबार से,
जाने कब तु देख पायेगी,
मेरी मोहब्बत मेरे इन्तेज़ार में|

2 comments:

  1. कभी तो वो सुबह होगी जरूर ....

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