Thursday, January 12, 2012

इन्तेज़ार

आखिरी मुलाकात अब भी याद है,
कर खुद को राज़ी किया फैसला,
इज़हार इश्क का उनसे हम करेंगे,
आज दिल को खुली किताब बना देंगे,
हर ख्वाब हर ख्वाहिश हर अरमान,
हर खता का ज़िक्र कर देंगे|
जाने कितनी शायरी करो बेकार है,
कर नहीं सकती वे उनको ज़रा भी बयां,
मेरे अलफ़ाज़ लडखडा कर टूट जाते है,
महज़ उनका ज़िक्र करने भर में,
जाने और कितनी बातें उनसे कहने को,
मन में लिए उन तक पंहुचा,
सलाम दुआ कर जब कहने को हुआ,
वे बोली अभी आती हूँ कुछ पल ठहरो,
पल गुज़रे,दिन गुज़रे,गुजर गए साल कई,
अब भी इतेजार है इज़हार के पल का,
संग लिए बैठा हूँ तोहफा दिल का,
इनकार और इकरार दोनों ही मंज़ूर है,
मोहब्बत का सफर शुरू करने के लिए,
कोई उन तक मेरा पैगाम पंहुचा दे,
की अब भी नज़रे राहों पर टिकी है,
हर पल हलचल का इतेजार कर रही है|

खुद खुदा भी मुझसे हो चूका है खफा,
लौटा दिए  कितने फरिस्ते उसके ,
लेकर आये  जो मौत का पैगाम,
अब पथराई आँखों में है इतेजार ,
कब अपनी साँसों  को दूँ विराम ,
थका इतेजार से अब भी नहीं 
बस इस जिंदगी पर अब हक नहीं| 

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर मनोभाव्।

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    1. बहुत सुंदर मन के भाव ..

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  2. ... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

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